दिल-ओ-दिमाग़ में ऐसे बस गई हो तुम
सामने हो तो भी तुम्हारे ख़यालों में रहता हूँ
जिन अदद मसलों का कोई जवाब नहीं
ऐसे बेतरतीब उलझे हुए सवालों में रहता हूँ
तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिली जाना
बस ऐसे ही ग़म-ओ-मलालों में रहता हूँ
जब तुम्हारी सोहबत का तसव्वुर करता हूँ
दिन नहीं माह नहीं मनु सालों में रहता हूँ